Sunday, August 20, 2023



 

ऊपर का चित्र पुराने मकान का है जिसमें पीछे की ओर (पच्छिम में ) पुस्तकालय वाला भवन था, जिसे आप दाहिनी ओर के चित्र में देख सकते हैं | यह पुस्तकालय भवन १९५४ में मेरी देख-रेख में बना था | नीचे एक चित्र में इसी का ढहा  हुआ चित्र देखा जा सकता है | एक चित्र नीचे में नयी बनी चहार दीवारी का है |








आ. शिवपूजन सहाय स्मारक निर्माण योजना  

आ. शिवपूजन सहाय न्यास ने आ. शिवजी की स्मृति में उनके गाँव उनवांस (बक्सर से १५ कि.मी. दक्षिण) में एक स्मारक निर्माण का संकल्प कई वर्ष पहले लिया था | इसकी योजना के अनुसार उनवांस में शिवजी के पैत्रिक मकान के स्थान पर एक भव्य स्मारक का निर्माण होना है | कई कारणों से इस कार्य में अब तक विलम्ब होता आया है – यद्यपि इस दिशा में २०१८ में ही कार्य प्रारम्भ किया जा चुका था |

यहाँ दिए गए चित्रों को देख कर इस योजना को समझा जा सकता है | चित्र में देखा जाने वाला शिवजी का यह पुश्तैनी मकान अब नहीं है | इस पुराने मकान का बड़ा चित्र यहाँ दिया गया है | यह मकान शिवजी के जन्म के बाद बना था, हालांकि इसी ज़मीन पर बने कच्चे मकानों में पहले उनके पूर्वज – दादा-परदादा - रहते आये थे | इसके भीतरी हिस्से में एक चौकोर आँगन था जिसके बीच में एक बेल का वृक्ष था, और चारों और के बरामदों से लगे हुए बारह कमरे थे | लगभग १९४५ के आपसी बटवारे में मकान का पच्छिमी भाग शिवजी के हिस्से में मिला था |

यह मकान शिवजी के जन्म के बाद बना था | इस स्थान पर बने इस अंतिम मकान का यह चित्र मेरा खींचा हुआ है जो १९७० के लगभग तक इसी दशा में था | इसका रुख उत्तर दिशा की ओर था | सामने एक शामिल ओसारानुमा दालान थी | इसका प्रवेश द्वार पूरब की ओर था | दालान के सामने एक पूरब-पच्छिम लम्बा चबूतरा था | चबूतरे के पच्छिम ओर, शिवजी के समय मेरी ही देख-रेख में १९५४ में बना, ‘वागीश्वरी पुस्तकालय’ का भवन था | इस पुस्तकालय भवन का रंगीन  चित्र भी यहाँ देखा जा सकता है | पूरे मकान का पच्छिमी हिस्सा शिवजी के परिवार के लिए था जिसमें आगे के चबूतरे के पच्छिमी छोर पर यह पुस्तकालय भवन बना था, और पूर्वी भाग उनके छोटे दिवंगत भाई रामपूजन लाल के परिवार के हिस्से में था | इस पुराने हिस्से के मकान को तोड़ कर रामपूजन लाल के वंशजों ने इधर अपना नया मकान बना लिया है ( जो नयी बनी चहारदीवारी के चित्र में पूरब की ओर स्थित है )| स्मारक की योजना के अनुसार शिवजी के पच्छिम की ओर के भीतरी मकान और पुस्तकालय भवन (जिसकी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं गाँधी संग्रहालय, पटना और नेहरु म्युज़ियम, नयी दिल्ली, में संरक्षण के लिए पहले ही भेजी जा चुकी थीं ) - उस सब को ढहा कर उसी स्थल पर अब  शिवजी का नया स्मारक बनाने की योजना बनायी गयी है | चित्रों में शिवजी के हिस्से के भीतरी मकान और पुस्तकालय को योजना के अनुसार २०१८ में ढहाया गया था, जिसके बाद कोरोना-काल में निर्माण का काम अचानक रुक गया था | ध्वन्सीकरण के उस समय के चित्रों को भी यहाँ दिया गया है जिन्हें देख कर इसकी भोगौलिक स्थिति समझी जा सकती  है | अब इधर (मार्च से जून, २०२३ में) उसी ज़मीन को चारों ओर चहारदीवारी से घेर दिया गया है | योजना के अनुसार अब यह चहारदीवारी से घिरी ज़मीन भी न्यास के नाम से हस्तांतरित की जा रही है, जिसके निर्माण और आगे रख-रखाव का दायित्त्व पूर्णतः न्यास के अधीन रहेगा |





यहाँ दिए गए नक्शों में प्रस्तावित स्मारक की योजना दी गयी है | चहारदीवारी से घिरी आयताकार ज़मीन उत्तर-दक्खिन फैली है जिसका रकबा लगभग ढाई कट्ठा है | नक़्शे में उत्तर पूर्वी कोने पर स्मारक का मुख्य प्रवेश द्वार है जो पूरब-स्थित एक बरामदे पर खुलता है | उत्तर-दक्खिन फैला यह बरामदा पूरब की दीवाल से सटा है जिसके सामने पच्छिम में खुला आँगन है | दक्खिन की ओर पूरब में एक सीढी है, और पच्छिम ओर एक बड़ा हॉल है जिसमें पच्छिम दीवाल से लगी आ. शिव की एक प्रतिमा स्थित होगी और हॉल में प्रदर्शन की विभिन्न वस्तुएं रहेंगी | उत्तर की ओर दो कमरे और एक शौचालय होंगे, जिसमें एक कमरा अतिथि-गृह और दूसरा कार्यालय-कक्ष होगा | उत्तर और दक्खिन में भी हॉल और दोनों कमरों के सामने पूरब वाले बरामदे से लगायत बरामदे रहेंगे | यह एक व्यावहारिक, सीधा-सादा, कम खर्च में बनने वाला स्मारक होगा जो गाँव के परिवेश के अनुकूल होगा | अभीतक पुराने मकान को ढहाने और चहारदिवारी बनवाने में लगभग ४.५० लाख रुपये लगे हैं, जिसमें ३.५० लाख न्यास ने दिया है और १ लाख का अनुदान मैंने अपने पेंशन में से दिया है | लेकिन इसके साथ ही न्यास के कोष में अब बहुत कम राशि बच रही है |

यहाँ नमूने के तौर पर बाएं एक चित्र है जो अमेरिकी लेखक एडगर एलेन पो के रिचमंड में बने मेमोरियल का है | दक्खिन में बनने वाला हॉल कुछ इसी तरह का होगा | बीच के आँगन में भी इसी तरह की हरियाली - पेड़-पौधे रहेंगे |





इन नक्शों के मुताबिक अब आगे का काम पर्याप्त धन-संग्रह के बाद ही शुरू हो सकेगा | इन नक्शों के मुताबिक़ आगे लगभग १० से १५ लाख रु. के खर्च का अनुमान है | योजना यही है कि यह राशि सार्वजनिक धन-संग्रह से एकत्र की जाएगी | यहाँ यह प्रतिवेदन इसी उद्देश्य से प्रकाशित किया जा रहा है कि आ. शिवजी के परिवार-जन और अन्य साहित्यिक स्रोतों से धन-राशि न्यास के कोष में जमा की जा सके ताकि आ. शिवजी की स्मृति में एक सुन्दर स्मारक का निर्माण हो सके | इस प्रतिवेदन के पाठकों से अनुरोध है कि इस सम्बन्ध में जिज्ञासा के लिए - और संभावित अर्थदान के लिए भी - नीचे दिए गए सूत्रों का उपयोग किया जा सकता है | -

 

१.श्री विजयप्रकाश, कार्यकारी अध्यक्ष, आ. शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास, पटना

   मो. 9771498909 / 7004266500

२. डा. मंगलमूर्ति, सचिव, मो. 7752922938 bsmmurty@gmail.com

३. श्री आर. के. शरण, सहायक सचिव : मो. 9415336674 / 8318090896

  न्यास बैंक खाता विवरण जिसमें (उपर्युक्त व्यक्तियों से संपर्क के बाद) धनराशि सीधे जमा की जा सकती है :

Acharya Shivpoojan Sahay Memorial Trust

 SB a/c no. 18630100002863,  IFSC : BARB0SAVOGAM (0  is Zero)

Bank of Baroda,Vipul Khand, Gomti Nagar, Lucknow :226010

कृपया इस प्रतिवेदन को अधिक-से अधिक व्यक्तियों तक पहुंचाने का प्रयास करें | आ. शिवजी से सम्बद्ध साहित्य को कम मूल्य पर प्राप्त करने के लिए भी सचिव डा. मंगलमूर्ति से संपर्क किया जा सकता है | पुस्तकों की की एक सूची यहाँ नीचे दी गयी है जिसमें सारी सूचनाएं दी गयी हैं | पुस्तकों के विक्रय से प्राप्त राशि भी सीधे न्यास के खाते में जमा होगी और इसी निर्माण कार्य में लगाई जाएगी | इस विषय में आप सभी का पूर्ण सहयोग अपेक्षित है |


                             वागीश्वरी  प्रकाशन

                    नाइन थर्सडेज प्रा. लि., लखनऊ की प्रकाशन योजना

                       एच-701, सेलेब्रिटी गार्डन्स, सुशांत गोल्फ सिटी, अंसल एपीसी, लखनऊ : 226030

                     rksharan411@gmail.com / bsmmurty@gmail.com Mob. 91+9415336674/7752922938

  

पुस्तक-सूची

१.    १.  शिवपूजन सहाय साहित्य-समग्र (१० खंड )   सजिल्द -       ११,०००/- 

२.   २.   शिवपूजन सहाय साहित्य-समग्र (१० खंड )   पेपर बैक –      ४,०००/-

३.     ३. शिवपूजन सहाय : रचना संचयन                                         ४५०/-

४.     ४. शिवपूजन सहाय (अंग्रेजी मोनोग्राफ )                                      ५०/-

५.    ५.  देहाती दुनिया (शिवपूजन सहाय)                                          ३५०/-

६.     ६. ग्राम-सुधार (शिवपूजन सहाय)                                             २००/-   

७.    ७.  व्याकरण दर्पण (शिवपूजन सहाय)                                         ३००/-

८.     ८. निबंध-समग्र (शिवपूजन सहाय)                                             ७००/-

९.     ९. मेरा बचपन (शिवपूजन सहाय)                                               २९९ /-

१०.हिंदी की गद्य परंपरा (शिवपूजन सहाय)                         २९९/-

११. प्रवासी की आत्मकथा (भवानी दयाल सन्यासी)                ९९५/-

 १२. प्रेमचंद पत्रों में                                                               ५९५/-

१३.जानवर फ़ार्म (जॉर्ज ऑरवेल, अनु. मंगलमूर्ति )                    २२५/-

१४. चाबी (जापानी उपन्यास, अनु. मंगलमूर्ति )                         ३९५/-

१५. सुनो पार्थ (गीता सरल हिंदी अनु. मंगलमूर्ति )                      २९५/-

१६. श्रीरामचरितमानस (कथा-सार ले. मंगलमूर्ति )                         २९५/-

१७. मन एक वन (हिंदी कवितायें, ले. मंगलमूर्ति )                          ३९५/-

१८. टू वे मिरर (अंग्रेजी कवितायें, ले. मंगलमूर्ति)                          ३९५/-

१९. दि हॉन्टेड पैलेस ( एडगर पो का अध्ययन, ले. मंगलमूर्ति)          ८००/-

२०. दि क्रिटिकल पर्सपेक्टिव (ले. मंगलमूर्ति)                                ९९५/-

२१. दर्पण में वे दिन (संस्मरण, ले. मंगलमूर्ति)                              ९९५/-

२२. स्टोरी ऑफ़ राम (वाल्मीकि रामायण रीटोल्ड ले. मंगलमूर्ति)       ३९५/-

२३. विजार्ड इन द स्ट्रीट (पो की कहानियाँ. सं.मंगलमूर्ति)                ७९५/-

२४हिंदी-भूषण शिवपूजन सहाय (सं.मंगलमूर्ति)                                         ४००/-

२५. मेरा जीवन (सं. मंगलमूर्ति)          सजिल्द ५९५/-            अजिल्द  २५०/-

२६. स्मृति-शेष             सजिल्द   ५९५/-         अजिल्द    २५०/-


इनमें से कुछ पुस्तकों के आवरण-चित्र                                  
















ध्यान दें :

न्यास के स्मारक-निर्माण में धन-राशि प्रदान करने के इच्छुक सभी व्यक्तियों को इन सभी पुस्तकों पर सीधे ५०% की छूट दी जाएगी जिसमें मुफ्त डाक खर्च शामिल होगा | इसके लिए कृपया पहले चयनित पुस्तकों की ५०% मूल्य-राशि न्यास के (ऊपर दिए) खाते में सीधे जमा करके अपना पूरा डाक-पता देते हुए उसकी रसीद वाटसैप पर (Mob. 7752922938)  भेज दें जिसके बाद तुरत चयनित पुस्तकें उस पते पर भेज दी जाएँगी | यह स्मारक-निर्माण के लिए धन-संग्रह का ही एक सहायक उपक्रम होगा | आशा है न्यास के इस उपक्रम में आपका पूरा सहयोग प्राप्त होगा |    



Friday, January 20, 2023

 

आचार्य शिवपूजन सहाय : ६० वीं पुण्य-तिथि

[९ अगस्त १८९३ – २१ जनवरी १९६३]

 

जनवरी २१ (१९६३) के ब्राह्म मुहूर्त्त (३.१०) में आ. शिवपूजन सहाय का पटना के सरकारी अस्पताल में  यूरिमिया-जनित अचेतनावस्था में महाप्रयाण हुआ था |  उस अवसर का मेरा एक संस्मरण मेरे ब्लॉग vibhutimurty.blogspot.com/2018/6 (Jun 17)पर पढ़ा जा सकता है | उस महाशोक-प्रसंग में उनकी पहली पुण्यतिथि (२१.१.’६४) पर बि. हिं. सा. सम्मलेन के मुख-पत्र ‘साहित्य के ‘शिवपूजन-स्मृति अंक में हिंदी साहित्य-जगत के अनेक प्रसिद्ध साहित्यकारों की जो श्रद्धांजलियाँ प्रकाशित हुई थीं उनमें निम्नांकित विशेष उद्धरणीय हैं -        

“उनकी हिंदी सेवाएँ बहुमूल्य थीं | वे नम्रता, शालीनता और कर्मठता के मूर्त्तिमान रूप थे | उनके देहांत से हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है |” - पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी 

“श्री शिवपूजन जी के देहावसान से हिंदी ने अपना तेजस्वी और तपस्वी पुत्र खो दिया |” – महादेवी वर्मा

“सहाय जी अपने यशः काय से उस समय तक जीवित हैं , जब तक हिंदी जीवित है | वे मुझ जैसे हजारों के साहित्यिक पिता थे |” –हरिवंश राय ‘बच्चन

आज आ. शिव के जन्म-ग्राम उनवांस (बक्सर) में, दिल्ली, पटना एवं अन्य विभिन्न स्थानों में उनकी पुण्य-स्मृति में विशेष आयोजन किये गए हैं | उनकी स्मृति में १९९३ (शती-वर्ष) में स्थापित ‘आ. शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास द्वारा पिछले तीन दशकों में जो कार्य संपन्न हुए हैं न्यास के इस ब्लॉग – shivapoojan.blogspot.com पर उनका पूरा विवरण देखा जा सकता है |

आज के इस विशेष अवसर पर न्यास द्वारा इधर प्रकाशित उनकी ४ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों – ‘मेरा जीवन. ‘स्मृतिशेष’,  ‘निबंध-समग्र’ तथा 'निबंध-समग्र'  का लोकार्पण हो रहा है | विशेष ५०% छूट पर इन्हें प्राप्त करने के लिए कृपया संपर्क करें – 7752922938/ 9451890020  न्यास की आ. शिवपूजन सहाय पुस्तक प्रसार योजना के अनतर्गत  कुछ अन्य पूर्व प्रकाशित पुस्तकों को भी इसी छूट पर प्राप्त किया जा सकता है | पुस्तकों के चित्र यहाँ दिए जा रहे हैं | 

न्यास के इस ब्लॉग पर समय-समय से सम्बद्ध सूचनाएं प्रकाशित की जाती हैं | आप इन्हें देखा करें यही अनुरोध है | न्यास की  अभी सबसे प्राथमिक योजना है आ. शिव जी के जन्म-ग्राम उनवांस में उनके पैतृक आवास की भूमि पर उनका स्मारक निर्माण जिसका काम कोरोना काल में ३ साल से रुक गया था जो अब शीघ्र प्रारम्भ हो रहा है | उसके निर्माण में अर्थ-राशि संग्रह के लिए न्यास के निर्णय के अनुसार शीघ्र ही एक अपील जारी होगी जिसे यहाँ भी देखा जा सकेगा | 

आज लोकार्पित होने वाली ४ पुस्तकों और पूर्व प्रकाशित अन्य पुस्तकों के चित्र यहाँ दिए जा रहे हैं |                                           - मंगलमूर्त्ति, न्यास-सचिव 








५९५/- 


    ५९५/-            





                                                              ७००/-




                                                                                                           
४५०/-        

२९५/-
 २९५/-



सजिल्द ११,०००/-     पेपरबैक   -४०००/-
९९५/-


५०/- 

                                                                                                                                                                                                                                             ७००/-                                                                      

Tuesday, August 9, 2022

 आ. शिवपूजन सहाय : १२९ जयंती 

आज आ. शिवपूजन सहाय कि १२९ वीं जयंती कई स्थानों पर मनाई गयी | वे सम्पूर्ण हिंदी जगत में सदा एक महान संत साहित्यकार के रूप में सम्मानित रहे हैं |  उन पर -vibhutimurty.blogspot.com पर बहुत सी पठनीय सामग्री देखी  जा सकती है | वहीं  अभी उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ में आयोजित एक समारोह (3 अगस्त, 22) में                 ( अस्वस्थता के कारण मेरी अनुपस्थिति में पठित) मेरा  प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय की कथा-भाषा पर एक आलेख पढ़ा जा सकता है |अखबारों में भी कई लेख प्रकाशित हुए हैं | पत्रिकाओं में भी लेख बहिधा प्रकाशित होते रहते है जिससे हिंदी के इन सम्मान्य लेखकों कि प्रासंगिकता रेखांकित होती रहती है |

यहाँ आप पढ़ें आज फेसबुक पर अंकित एक  रिपोर्ट  जो रेल मंत्रालय(दिल्ली) में आयोजित एक समारोह की है, जिसे  रेल राजभाषा विभाग के अधिकारी ( मेरे पूर्ववर्त्ती छात्र) श्री बरुन कुमार ने पोस्ट किया है जिसमें कई चित्र भी हैं | उनके इस प्रयास के लिए आ. शिवपूजन सहाय न्यास उनके विभाग और रेल मंत्रालय के प्रति विशेष आभारी है |  उनकी रिपोर्ट:

आज ९ अगस्त है, आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्मदिन। वे एक बड़े सम्पादक, लेखक, पत्रकार थे। लेकिन उनकी जयंती बहुत कम देखने को मिलती है जिसका कारण है इसके कुछ ही दिन पूर्व ३१ जुलाई को प्रेमचंद की जयंती पड़ना। दोनों लेखकों का लेखन-क्षेत्र भी एक ही है - गद्य और उसमें कथा-साहित्य एवं सम्पादन, और पत्रकारिता भी। इसलिए प्रेमचंद के विराट आभामंडल के सामने शिवपूजन जी अचर्चित या अल्पचर्चित रह जाते हैं। साहित्य अकादमी ने एक बार दोनों साहित्यकारों की संयुक्त जयंती मनाई। एक सजग समाज अपने विराटों को याद तो करता ही है, अपने अन्य महत्वपूर्णों को भी विस्मृत नहीं होने देता।








इस बार हमने ०५ अगस्त २०२२ (शुक्रवार) को रेल मंत्रालय में प्रेमचंद और शिवपूजन जी की संयुक्त जयंती मनाई। जयंती का उद्घाटन अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड श्री वी.के.त्रिपाठी जी ने दीप प्रज्वलन एवं दोनों साहित्यकारों के चित्रों पर माल्यार्पण व श्रद्धा सुमन अर्पित करके किया। इस अवसर पर बोर्ड के सदस्य, अपर सदस्य,महानिदेशक, कार्यपालक निदेशक एवं अन्य उच्चाधिकारीगण समेत बड़ी संख्या में कर्मचारीगण उपस्थित थे। अध्यक्ष महोदय ने बड़ी रुचिपूर्वक दोनों साहित्यकारों पर आयोजित प्रदर्शनी का रुचिपूर्वक अवलोकन किया और पुस्तिका में प्रशंसात्मक टिप्पणी दर्ज की। प्रधान कार्यपालक निदेशक श्री दीपक पीटर गैब्रियल ने इस तरह के आयोजन के महत्व को रेखांकित किया।

भारतीय रेल में हिंदी भाषा एवं साहित्यकारों के लिए संस्थागत सम्मान है एवं पूरे क्षेत्रीय रेलों के मुख्यालयों, डिवीजनों, कारखानों, प्रशिक्षण केंद्रों, उपक्रमों, अन्य इकाइयों से लेकर स्टेशनों तक में इनसे संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।


Friday, April 8, 2022

 

आचार्य शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास

शोक प्रस्ताव : ९ अप्रैल, २०२२

“आचार्य शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास की निबंधित प्रथम न्यासी समिति के सम्मानित सदस्य श्री रामचंद्र खान, आई.पी.एस, का आज ब्राह्म वेला में (रात्रि ३ बजे), पटना में निधन हो गया | वे कुछ समय से ह्रदय रोग से ग्रस्त थे | न्यास के गठन (१९९३) की प्रारम्भिक समिति के वे माननीय मनोनीत सदस्य रहे और उसकी सभी गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़े रहे थे | पिछले दो वर्षों से न्यास की बैठकें पटना में नहीं हो पा रही हैं, किन्तु उससे पूर्व ४ जुलाई, २०१८ को हुई न्यास की ३० वीं बैठक में वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती उषा किरण खान के साथ उपस्थित थे |

“श्री रामचंद्र खान ने आरक्षी सेवा के  उच्चतम पदों पर रहते हुए बिहार की लम्बी अवधि तक निष्ठावान सेवा की | वे मिथिला की विख्यात साहित्यिक परंपरा से जुड़े, हिंदी साहित्य में भी गहरे गहरी पैठ रखने वाले व्यक्ति थे, और अपनी उच्च कोटि की वक्तृता के लिए विख्यात रहे | उनके निधन से पटना और बिहार के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक स्थायी अभाव बना रहेगा | आचार्य शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास समिति इस शोक-प्रस्ताव के द्वारा उनकी पावन स्मृति को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है, और उनके शोक-संतप्त परिवार के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट करती है |”

 ऊपर चित्र: साभार फेसबुक 

नीचे सभी चित्र (C) मंगलमूर्ति

श्री रामचंद्र खान मिथिला के एक विशिष्ट पंडित-परिवार के मेधावी वंशज थे जिनके परिवार को शास्त्रीय पांडित्य के लिए कभी ‘खान’ पदवी प्राप्त हुई थी | मेरा उनसे व्यक्तिगत परिचय ७० के दशक में मुंगेर में हुआ जब वे वहां जमालपुर में प्रोबेशनर आरक्षी अधीक्षक पद पर आये थे | अपने सुदर्शन व्यक्तित्त्व और मृदुल व्यवहार के कारण वे शीघ्र ही वहां नगर के सर्वप्रिय व्यक्ति हो गए | मुंगेर समाज सेवा समिति में वे हमारे सहकर्मी एवं परामर्शी भी रहे | श्री खान के साथ मेरा यह स्नेह-सूत्र तबसे बंधा रहा, और बाद में जब १९९३ में आ. शिवपूजन सहाय के जन्म-शती वर्ष में हमने एक न्यास का गठन किया तब वे उसकी प्रारम्भिक न्यासी समिति के सम्मान्य मनोनीत सदस्य रहे | श्री खान में वंशानुगत विद्वत्ता के साथ सामाजिक सहृदयता का मणि-कांचन संयोग था | उन्होंने लम्बा सार्थक जीवन व्यतीत करके गोलोक गमन किया | उनकी स्मृति स्वर्ग में सदा शोभित रहे, हमारी उनको यही श्रद्धांजलि है |







            

Thursday, March 10, 2022

 सन्दर्भ : लेखक की रॉयल्टी

विनोद कुमार शुक्ल जी से संबद्ध प्रसंग में कल मैंने अपने फेसबुक पेज पर एक छोटी टिप्पणी लिखी थी | उसका सम्बन्ध मेरे पिता के उपन्यास 'देहाती दुनिया' से है जिसे पेपरबैक संस्करण में राजकमल १९९४ से छाप रहा है, और जिसकी रॉयल्टी विवरण और भुगतान गत ३ वर्षों से नहीं मिलने पर जो पत्र मैंने ७/१/२२ को ईमेल से भेजा था उसका आजतक कोई उत्तर नहीं आया है | उससे पहले भी उसका २००२-२००९ का कोई हिसाब या रॉयल्टी भुगतान हमें नहीं मिला | स्पष्टीकरण से यह पता नहीं चलता कि प्रकाशक ने कितनी प्रतियां कितने संस्करणों में छापी-बेचीं - यह लेखक कैसे जान सकेगा ? अनुबंध की एकतरफा शर्तों का पालन भी वे शायद ही करते हैं | ध्यातव्य है कि हमलोगों ने पिता के नाम पर एक न्यास शती-वर्ष १९९३ में ही स्थापित कर दिया था और उनकी सभी रचनाओं का स्वत्त्वाधिकार उस न्यास में समाहित कर दिया था | शुरू से न्यास के कार्य-कलाप का विवरण उसके ब्लॉग - shivapoojan.blogspot.com पर देखा जा सकता है |
उक्त टिप्पणी में मेरे पिता की एक पुस्तक ‘निबंधों की दुनिया:शिवपूजन सहाय’ का वाणी प्रकाशन से जुड़े एक प्रसंग का भी संक्षिप्त उल्लेख है | पुस्तक को वाणी ने बिना हमें कोई सूचना दिए और किसी अनुबंध के २०१२ में छाप लिया | (C) में ‘लेखक और उत्तराधिकारी’ छापा, पर न इसकी कोई सूचना दी, और न २०१२ से २०१७ तक कोई रॉयल्टी विवरण या भुगतान हमें भेजा | जब २०१७ में मुझको पता चला और मैंने अमेज़न से पुस्तक की प्रति मंगाई और वाणी को पत्र लिखा, तब भूल स्वीकार करते हुए क्षमा-प्रार्थना की और २०१२ से २०१७ तक का ७.५% रॉयल्टी का चेक (६००/१८५ बिकी प्रति का) भुगतान भेजा जो न्यास के खाते में जमा हुआ | २.५% रॉयल्टी अंश संपादक के नाम रख लिया जबकि (C) में केवल लेखक का नाम है, और नियमतः १०% रोयल्टी पर केवल लेखक का अधिकार होता है | पुस्तक का सम्पादन भी कितना अशुद्धि-पूर्ण है इसकी कुछ झांकी ब्लॉग-प्रविष्टि में देखी जा सकती है | विनोद शुक्ल-विवाद में राजकमल के स्पष्टीकरण के प्रसंग में इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि दोनों प्रकाशन-गृह एक ही समूह के हैं | वाणी ने २०१८ से २०२१/२२ का फिर कोई रॉयल्टी विवरण या पूरा उचित भुगतान या भूल- सुधार आदि नहीं भेजा है, और न १६.१२.२१ के मेरे ईमेल पत्र का संतोषजनक कोई उत्तर दिया है | राजकमल के स्पष्टीकरण के साथ दोनों प्रकाशनों का यह श्याम-पक्ष भी सामने आना आवश्यक है, ताकि संतुलित निष्कर्ष निकल सके | इन दोनों प्रसंगों की चर्चा पत्र-प्रतिलिपियों के साथ किंचित विस्तार से न्यास के इसी ब्लॉग पर शीघ्र ही देखा जा सकता है |
ये दोनों हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन गृह हैं और एक मार्ग-दर्शक भूमिका ये निभा सकते हैं | मेरे पिता के रॉयल्टी शोषण की कहानी और बहुत पुरानी और लम्बी है, और मैं हिंदी-संसार की जानकारी के लिए उसे अपने दोनों ब्लॉग पर ही विस्तार से लिखना चाहता हूँ| ये ब्लॉग हैं –shivpoojan.blogspot.com & vibhutimurty.blogspot.com लिखने पर फेसबुक पर पूर्व सूचना भी दूंगा |
यह एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है जो इस बार अपने समय से उजागर हुआ है, और मैं समझता हूँ प्रकाशकों और लेखकों के साथ ही पुस्तकों की थोक खरीद से जुडे सभी लोगों को मिलकर अब इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि यह चोरी, विश्वासघात और भ्रष्टाचार कैसे मिटे | शायद अब इसका समय भी आ गया है | मेरे पिता ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणियों में इस पर विस्तार से लिखा है | एक-दो प्रकाशकों को लिखी उनकी नीम-कानूनी चिट्ठी भी ‘समग्र’-१० (२२८-३०) में प्रकाशित है जिसके अंश मैं फिर अपने इन ब्लॉगों पर भी डालूँगा | रॉयल्टी और पारिश्रमिक की मार से ही प्रेमचंद, निराला जैसे नवजागरण के अनेक लेखकों को घोर मुफलिसी में जीवन बिताना पड़ा | इससे हिंदी साहित्य लेखन की स्तरीयता और हित का प्रश्न गहराई से जुड़ा है | मेरा उद्देश्य केवल इस प्रश्न को समाधान के लिए उपस्थित करना है, लेकिन किसी प्रकाशक की प्रतिष्ठा को किसी प्रकार की हानि पहुँचाना मेरा कत्तई मकसद नहीं है | वाणी द्वारा प्रकाशित और, उनको लिखित वर्जना देने के बाद, मेरे सम्पादन में प्रकाशित पुस्तक'निबंध समग्र' के दोनों चित्र यहाँ दिए गए हैं जिनमें मेरे द्वारा संपादित ‘निबंध-समग्र’ अनामिका प्रकाशन से २०२१ में प्रकाशित हो चुका है, और दोनों पुस्तकों को आमने-सामने रखकर उनका अंतर देखा जा सकता है |

यह टिप्पणी और इससे जुड़ी एक और टिपण्णी कल फेसबुक पर प्रकाशित हुई है,| पहले वाली टिपण्णी विनोद शुक्ल-राजकमल विवाद के प्रसंग में थी | दोनों का सम्बन्ध शिवपूजन सहाय से है | पहली टिपण्णी की बातें इस टिपण्णी में आ गयी हैं | लेकिन इस टिपण्णी से सम्बद्ध और बहुत सी बातें अभी यहीं शीघ्र अंकित होंगी जिनमें वाणी द्वारा अनधिकृत रूप से प्रकाशित 'निबंधों की दुनिया' के सम्पादन की भद्दी अशुद्धियाँ भी उल्लिखित होंगी | कुछ समय बाद शिवपूजन सहाय के जीवन में प्रकाशकों ने उनके साथ कैसा दुर्व्यवहार किया (जिसका मैं स्वयं साक्षी और भुक्तभोगी रहा) इसका भी एक संक्षिप्त उल्लेख होगा | क्योंकि यह कहानी भी अब सामने आनी चाहिए जिसे मैं ही पूरी तरह बता सकता हूँ | जब वह पूरी कहानी सप्रमाण लिखी जाएगी तो वह दूसरे ब्लॉग विभुतिमूर्त्ति पर भी पढ़ी जा सकेगी | अभी वाणी वाली पुस्तक की त्रुटिपूर्ण सम्पादकीय भूमिका की कुछ बानगी देख लीजिये |छोटी-मोती तथ्यात्मक भूलें तो अनेक हैं (जैसे १९१३ में छोटे भाई का देहांत हो गया,१९२८ में दूसरी पत्नी का देहांत हो गया, 'साहित्य-भूषण' उपाधि निराला ने दी, आदि)| लेकिन सबसे गंभीर भूल है - 'गंगा' में 'भट्नायक' कल्पित नाम से प्रकाशित श्यामसुंदर दास-लिखित 'हिंदी भाषा और साहित्य' की समीक्षा की चर्चा में उस पुस्तक के लेखक का नाम 'हरिऔध' बताना | फिर शिवजी के विषय में यह लिखना कि "जिए वे ठसक के साथ'| यदि आप पूरी भूमिका पढेंगे तो 'हास्यास्पद' शब्द भी उसके लिए प्रशंसात्मक ही लगेगा | क्या किसी प्रतिष्ठित प्रकाशक को ऐसी पुस्तक प्रकाशित करना शोभा देता है? 'विद्यापति पदावली' को 'विद्यापति रचनावली' लिखा गया है | बारह पेज की भूमिका भूलों से भरी हुई है | एक वाक्य देखिये -"मतवाला मंडल के लेखकों में हिंदी लिखना सबसे पहले उन्हीं ने (शिव जी ने) शुरू किया था | "

एक तो भ्रष्ट भूमिका, फिर बिना अनुमति के पुस्तक का प्रकाशन,फिर चुप बैठे रहना और टोकने के बाद ७.५% रॉयल्टी भी आधा अधूरा देना | क्या यह सब अनुचित, अशोभनीय व्यवहार नहीं है? क्या स्पष्टीकरण से इन अनुचित बातों का कोई तालमेल बैठता है? लेखक या उसका उत्तराधिकारी ही क्या करे, सारा जीवन-व्यापार छोड़कर ऐसे प्रकाशकों से लिखा-पढ़ी, कोर्ट-कचहरी करे ? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसपर गंभीरता से विचार करने का समय अब आ गया है |

इस प्रसंग में मेरे अगले आलेख की कृपया प्रतीक्षा करें जिसकी सूचना भी मैं फेसबुक पर समयानुसार पहले दे दूंगा |


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